Thursday, March 12, 2009

मोबाइल मेनिया

इन दिनों जिस ख़बर का बाज़ार बहुत गर्म है वह है - ' सेहत के लिए खतरनाक है मोबाइल ' । डाक्टरों का कहना है कि मोबाइल पर घंटों बात करने से सिरदर्द, अनिद्रा, घबराहट और तनाव जैसी गंभीर बीमारियाँ हो सकती हैं। इसलिए लोगों को मोबाइल से यथासम्भव परहेज करना चाहिए। अब साहब, मुसीबत तो दोनों तरफ़ ही है। माना कि मोबाइल पर बात करने से ये घातक बीमारियाँ हो सकती हैं मगर बात न करने से भी तो यही बीमारियां ही होंगी। जिस स्वजन से हम रोज़ घंटों बतियाते रहते हैं उससे अचानक बातचीत बंद हो जाने पर भी तो घबराहट, सिरदर्द, अनिद्रा और तनाव की ही शिकायत होगी। अब ऐसी हालत में क्या किया जाए जब आगे कुँआ हो और पीछे खाई। डेली रूटीन में शामिल हो चुका कोई काम अचानक तो ख़त्म होने से रहा। अतः डाक्टरों से मेरी अपील है कि वे कोई ऐसा रास्ता सुझाएँ जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।

Friday, October 10, 2008

बचपन

ना नजर वो रही, ना नजारे रहे ।
ना बचपन के दिन वो हमारे रहे ॥
ना तो तितलियाँ हमें छेड़ती हैं अब,
ना हम फूलों जैसे प्यारे रहे ॥ ना नजर ................................
जब दिल-ओ-जुबा दोनों से सच्चा था मैं।
जब एक छोटा सा बच्चा था मैं॥
माँ लोरी सुना के सुलाती थी जब।
मेरे ख्वाब में परियां आती थी जब॥
बड़े हुए हम तो सब कुछ खो गया,
अब ना मेरे यार चाँद -तारे रहे॥ ना नजर...........................
ऐसी जवानी की हमको थी चाहत कहाँ।
ना हो एक पल की भी फुर्सत जहाँ॥
हमें दूर अपनों से आना पड़ा।
अपना आशियाँ भी भुलाना पड़ा॥
हंसी तो जमाने से आई नहीं,
अब आंसू भी उतने न खारे रहे॥ ना नजर...........
हम पैरो में अपने खड़े हो गए।
लोग कहने लगे ki बड़े हो गए॥
अपना अच्छा बुरा सब समझने लगे।
हर मुसीबत से खुद ही निबटने लगे॥
ना तो ऊँगली अब थमाती है माँ ,
ना हम ऊँगली के सहारे रहे॥ ना नजर..................